ओबामा ने ईरान को जो नकदी से भरा विमान भेजा था उसकी पूरी सच्चाई

ओबामा ने ईरान को जो नकदी से भरा विमान भेजा था उसकी पूरी सच्चाई

क्या बराक ओबामा प्रशासन ने वाकई ईरान को रिश्वत देने के लिए कैश से भरा एक पूरा जहाज तेहरान भेजा था? डोनाल्ड ट्रंप अक्सर अपनी रैलियों और भाषणों में यह दावा करते रहे हैं। वो कहते हैं कि ओबामा ने प्लेन भरकर पैसे भेजे और बदले में अमेरिका को केवल गालियां और धोखा मिला। यह बयान सुनने में बहुत नाटकीय लगता है। राजनीति में ऐसी बातें तुरंत ध्यान खींचती हैं। लेकिन जब आप इस कहानी की तह में जाएंगे, तो आपको पता चलेगा कि सच उतना सीधा नहीं है जितना ट्रंप के भाषणों में दिखता है।

इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें हेडलाइंस से आगे बढ़कर असल दस्तावेजों और तारीखों को देखना होगा। यह कहानी केवल एक परमाणु समझौते की नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराने एक कानूनी विवाद की है जो साल 1979 की ईरानी क्रांति से जुड़ा है। You might also find this connected story insightful: Why The Khalid Sheikh Mohammed Trial Date Set For June 2028 Changes Everything.

उस नकदी से भरे प्लेन की असल कहानी क्या है

साल 2016 की शुरुआत में स्विट्जरलैंड के जिनेवा से एक अज्ञात कार्गो विमान ने तेहरान के लिए उड़ान भरी। उस विमान के अंदर लकड़ी के पैलेट्स (pallets) पर करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा बंधी हुई थी। इसमें यूरो, स्विस फ्रैंक और कई अन्य यूरोपीय देशों की करेंसी शामिल थी। ट्रंप इसी घटना को 'प्लेन भरकर पैसे देना' कहते हैं।

पर यह पैसा कोई दान, उपहार या रिश्वत नहीं था। यह असल में ईरान का ही अपना पैसा था जो पिछले 37 सालों से अमेरिकी बैंकों में फ्रीज पड़ा था। 1970 के दशक में ईरान के शाह (राजा) ने अमेरिका से फाइटर जेट और भारी सैन्य उपकरण खरीदने के लिए 400 मिलियन डॉलर का एक एडवांस पेमेंट किया था। साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हो गई। शाह को देश छोड़ना पड़ा और वहां अयातुल्ला खुमैनी की सत्ता आ गई। As discussed in recent articles by The Washington Post, the results are notable.

इसके बाद अमेरिका और ईरान के कूटनीतिक रिश्ते पूरी तरह टूट गए। अमेरिका ने न तो ईरान को वो हथियार दिए और न ही उनके 400 मिलियन डॉलर वापस किए। ईरान इस मामले को द हेग स्थित 'यूएस-ईरान क्लेम्स ट्रिब्यूनल' में ले गया। दशकों तक अंतरराष्ट्रीय अदालत में यह केस चलता रहा।

400 मिलियन डॉलर अचानक 1.7 बिलियन कैसे बन गए

जब 2015 में ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ ऐतिहासिक न्यूक्लियर डील (JCPOA) पर हस्ताक्षर किए, तो इसके समानांतर द हेग की अदालत में चल रहे इस पुराने मुकदमे को भी सुलझाने की कोशिश तेज हुई। अमेरिकी वकीलों को साफ दिख रहा था कि अदालत में अमेरिका यह केस हारने वाला है। अगर अदालत का फैसला आता, तो अमेरिका को ब्याज समेत करीब 10 बिलियन डॉलर तक चुकाने पड़ सकते थे।

ओबामा प्रशासन ने अदालत के अंतिम फैसले से पहले ही ईरान के साथ एक सेटलमेंट (समझौता) कर लिया। तय हुआ कि अमेरिका मूल रकम (400 मिलियन डॉलर) लौटाएगा और साथ ही 1.3 बिलियन डॉलर का ब्याज देगा। इस तरह कुल रकम 1.7 बिलियन डॉलर बनी। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के 'जजमेंट फंड' से इस पैसे को जारी किया गया।

अब सवाल उठता है कि ये पैसे बैंक ट्रांसफर के बजाय कैश में क्यों भेजे गए? इसका जवाब खुद अमेरिकी प्रतिबंधों में छिपा है। अमेरिकी पाबंदियों के कारण ईरान अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम (SWIFT) से पूरी तरह कटा हुआ था। अमेरिकी डॉलर में ट्रांजैक्शन करना कानूनी रूप से असंभव था। इसलिए अमेरिकी अधिकारियों ने स्विट्जरलैंड और नीदरलैंड के केंद्रीय बैंकों से मदद ली। डॉलर को यूरो और स्विस फ्रैंक में बदला गया और फिर उसे फिजिकल कैश के रूप में प्लेन से भेजा गया।

ट्रंप की नाराजगी और ओबामा की कूटनीति की टाइमिंग का खेल

ट्रंप और उनके समर्थकों का सबसे बड़ा आरोप यह रहा है कि यह पैसा असल में अमेरिकी कैदियों को छुड़ाने के लिए दी गई 'फिरौती' (Ransom) थी। इस आरोप के पीछे एक मजबूत टाइमिंग का तर्क है। जिस दिन (17 जनवरी 2016) कैश की पहली किस्त (400 मिलियन डॉलर) तेहरान पहुंची, ठीक उसी दिन ईरान ने अपनी जेल में बंद चार अमेरिकी नागरिकों को रिहा किया था। इनमें वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार जेसन रेजायन भी शामिल थे।

ओबामा प्रशासन ने शुरुआत में इन दोनों घटनाओं को पूरी तरह अलग बताया था। लेकिन बाद में अमेरिकी विदेश विभाग ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने इस कैश का इस्तेमाल एक 'लेवरेज' (दबाव के साधन) के रूप में किया था। जब तक अमेरिकी कैदियों को ले जाने वाला विमान तेहरान से सुरक्षित उड़ नहीं गया, तब तक कैश से भरे कार्गो प्लेन को वहां लैंड होने की अनुमति नहीं दी गई थी। आलोचक इसी बात को ढाल बनाते हैं कि यह सीधे-सीधे फिरौती का सौदा था।

राजनीतिक रूप से ट्रंप का यह कहना कि 'बदले में गालियां मिलीं' इस बात पर आधारित है कि इस भारी रकम के मिलने के बाद भी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और वहां की सेना का अमेरिका विरोधी रुख बिल्कुल नहीं बदला। ईरान ने अपने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को जारी रखा और मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सहयोगी देशों (जैसे इजरायल और सऊदी अरब) के खिलाफ अपनी आक्रामक नीतियां नहीं छोड़ीं। ट्रंप के नजरिए से यह अमेरिका की कमजोरी का प्रतीक था, जिसने उन्हें 2018 में इस न्यूक्लियर डील से बाहर निकलने की वजह दी।

इस पूरे विवाद से जुड़े कुछ अहम आंकड़े

इस पूरे मामले को बेहतर ढंग से समझने के लिए इन ठोस आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:

  • 400 मिलियन डॉलर: ईरान द्वारा 1979 से पहले हथियारों के लिए जमा की गई मूल राशि।
  • 1.3 बिलियन डॉलर: अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा तय किया गया संचित ब्याज।
  • 1.7 बिलियन डॉलर: कुल सेटलमेंट राशि जो तीन अलग-अलग किश्तों में पूरी तरह कैश में दी गई।
  • 37 साल: इस वित्तीय और कानूनी विवाद को सुलझाने में लगा कुल वक्त।
  • 4 अमेरिकी नागरिक: वह कैदी जिन्हें कूटनीतिक बातचीत और इस सेटलमेंट के दबाव के बाद रिहाई मिली।

इस ऐतिहासिक घटना को अब आप कैसे देख सकते हैं

यदि आप इस पूरे घटनाक्रम को निष्पक्ष होकर देखना चाहते हैं, तो आपको इस कूटनीतिक विवाद के दोनों पहलुओं को समझना होगा। आप इसे दो अलग-अलग नजरियों से जांच सकते हैं:

  1. ओबामा प्रशासन का पक्ष: अमेरिका ने एक ऐसा मुकदमा कोर्ट के बाहर सुलझा लिया जिसमें उसे भविष्य में कई गुना ज्यादा पैसे (शायद 10 बिलियन डॉलर तक) देने पड़ सकते थे। इस सेटलमेंट के दबाव का फायदा उठाकर उन्होंने सालों से बंद अपने नागरिकों को भी सुरक्षित घर वापस ला लिया।
  2. डोनाल्ड ट्रंप और आलोचकों का पक्ष: दुनिया के सबसे बड़े आतंकी समर्थक देश को Pallets पर लादकर अरबों का कैश देना गलत मिसाल पेश करता है। भले ही वह पैसा ईरान का ही क्यों न हो, कैश मिलने से उनके पास ऐसा फंड आ गया जिसे ट्रैक करना नामुमकिन था, और इसका इस्तेमाल सीरिया, यमन या लेबनान में उग्रवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता था।

यह पूरा विवाद कूटनीति बनाम घरेलू राजनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। जहां एक तरफ कानूनी बाध्यताएं और रणनीतिक समझौते थे, वहीं दूसरी तरफ इसकी क्रूर राजनीतिक टाइमिंग और कैश का स्वरूप था जिसने इसे एक अंतहीन विवाद बना दिया।

यदि आप इस विषय पर अमेरिकी विदेश विभाग की तत्कालीन ब्रीफिंग और इस मुद्दे पर हुए राजनीतिक घटनाक्रम को वीडियो के जरिए देखना चाहते हैं, तो इस विषय पर गहराई से बात करने वाला यह विश्लेषण देख सकते हैं। यह वीडियो पूरी टाइमिंग और इसके राजनीतिक प्रभाव को समझने में काफी मददगार साबित होगा।

अमेरिकी प्रशासन का ईरान कैश सेटलमेंट पर विश्लेषण

SR

Savannah Russell

An enthusiastic storyteller, Savannah Russell captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.